आदर्श
कितना मुश्किल होता है आदर्श को जीना
कहना आसान है मुश्किल है करना
अस्तित्व पर ही लग जाता है ग्रहण आदर्श के
जब सामना पड़ता है यह धर्मसंकट के
लोग लगते उठाने प्रश्न इसकी उपयोगिता पर कसते हैं जब फायदे , नुकसान की कसौटी पर
किंतु क्या आदर्श है उनके लिए
जो भागते पीछे सदा सुख के लिए
देखते अस्तित्व को अपने यहीं तक आप जो
यह है नहीं आदर्श का पथ आप के फिर साथ तो
दाम्पत्य
दाम्पत्य सुखमय है तो फिर क्या स्वर्ग से है क्या प्रयोजन ?
है अगर प्रतिकूल तो फिर नर्क से है क्या प्रयोजन ?
अनासक्त कर्मयोग
फूल केवल फूल होता है ।
यह खिलता है क्योंकि यह खिलता है ।
यह कब खुद के बारे में सोंचे ।
यह कब चाहे कि इसे कोई देखे ।
आत्मप्रशंसा
अपनी कहानी में तो होता हर कोई ही राम है ,
पर वही श्री राम है जो गैर की नजरों में हो ।
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