Wednesday, December 25, 2019

हो गई है पीर पर्वत- सी ... - दुष्यंत कुमार


हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

कृष्ण की चेतावनी - रामधारी सिंह दिनकर


वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।
मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान् हस्तिनापुर आये,
पांडव का संदेशा लाये।
‘दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रखो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!
दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशीष समाज की ले न सका,
उलटे हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य साधने चला।
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।
हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले-
‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।
यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।
बाँधने मुझे तो आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन, पहले तो बाँध अनन्त गगन।
सूने को साध न सकता है,
वह मुझे बाँध कब सकता है?
हित-वचन नहीं तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ, अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।
टकरायेंगे नक्षत्र-निकर, बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा, विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होगा।
भाई पर भाई टूटेंगे, विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे, सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा,
हिंसा का पर, दायी होगा।’
थी सभा सन्न, सब लोग डरे, चुप थे या थे बेहोश पड़े।
केवल दो नर ना अघाते थे, धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय,
दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!

Thursday, December 19, 2019

शिव का सबसे प्रभावशाली स्तोत्र-निर्वाण स्तोत्र




मनोबुद्धयहंकारचित्तानि नाहम्
न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे ।
न च व्योम भूमिर्न तेजॊ न वायु:
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥1॥

मैं न तो मन हूं, न बुद्धि, न अहंकार, न ही चित्त हूं
मैं न तो कान हूं, न जीभ, न नासिका, न ही नेत्र हूं
मैं न तो आकाश हूं, न धरती, न अग्नि, न ही वायु हूं
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु:
न वा सप्तधातुर्न वा पञ्चकोश:।
न वाक्पाणिपादौ  न चोपस्थपायू
चिदानन्द रूप:शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥2॥

मैं न प्राण हूं,  न ही पंच वायु हूं
,मैं न सात धातु हूं, और न ही पांच कोश हूं ,
मैं न वाणी हूं, न हाथ हूं, न पैर, न ही उत्‍सर्जन की इन्द्रियां हूं
,मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ
मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव:।
न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष:
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥3॥

न मुझे घृणा है, न लगाव है, न मुझे लोभ है, और न मोह
न मुझे अभिमान है, न ईर्ष्या
मैं धर्म, धन, काम एवं मोक्ष से परे हूं
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।


न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम्
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदार् न यज्ञा: ।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
चिदानन्द रूप:शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥4॥

मैं पुण्य, पाप, सुख और दुख से विलग हूं
मैं न मंत्र हूं, न तीर्थ, न ज्ञान, न ही यज्ञ
न मैं भोजन(भोगने की वस्‍तु) हूं, न ही भोग का अनुभव, और न ही भोक्ता हूं
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

न मे मृत्यु शंका न मे जातिभेद:
पिता नैव मे नैव माता न जन्म:
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य:
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥5॥

न मुझे मृत्यु का डर है, न जाति का भेदभाव
मेरा न कोई पिता है, न माता, न ही मैं कभी जन्मा था
मेरा न कोई भाई है, न मित्र, न गुरू, न शिष्य,
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।
न चासंगतं नैव मुक्तिर्न मेय:
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥6॥

मैं निर्विकल्प हूं, निराकार हूं
मैं चैतन्‍य के रूप में सब जगह व्‍याप्‍त हूं, सभी इन्द्रियों में हूं,
न मुझे किसी चीज में आसक्ति है, न ही मैं उससे मुक्त हूं,
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि‍, अनंत शिव हूं।


Lyrics of a Sufi Song

पिया मिलेंगे
जिसको ढूंडे बाहेर बाहेर वो बैठा है भीतर छुपके 
तेरे अन्दर एक समंदर क्यू ढूंडे तुपके तुपके 
जिसको ढूंडे बाहेर बाहेर वो बैठा है भीतर छुपके 
तेरे अन्दर एक समंदर क्यू ढूंडे तुपके तुपके 
अकल के परदे पीछे करदे 
अकल के परदे पीछे करदे 
घुंघट के पट खोल दे, तोहे पिया पिया 
तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे मिलेंगे
तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे मिलेंगे 

जिसको ढूंडे बाहेर बाहेर वो बैठा है भीतर छुपके 
तेरे अन्दर एक समंदर क्यू ढूंडे तुपके तुपके 
अकल के परदे पीछे करदे 
अकल के परदे पीछे करदे 
घुंघट के पट खोल दे 
तोहे पिया मिलेंगे, पिया मिलेंगे मिलेंगे 
तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे मिलेंगे 
तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे मिलेंगे 

पाके खोना खोके पाना होता आया रे
पाके खोना खोके पाना होता आया रे
संग साथी सा है वो तो मोहे साया रे
संग साथी सा है वो तो मोहे साया रे
लगा तूने जीना बस जी से जी मेरे
बोले सिने में वो तेरे धीमे धीमे
तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे मिलेंगे
तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे मिलेंगे
जिसको ढूंडे बाहेर बाहेर वो बैठा है भीतर छुपके
तेरे अन्दर एक समंदर क्यू ढूंडे तुपके तुपके

जो है देखा वही देखा तो क्या देखा है
जो है देखा वही देखा तो क्या देखा है
देखो वो जो औरो ने ना कभी देखा है
देखो वो जो औरो ने ना कभी देखा है
नैनो से ना हो ऐसा कुछ देखा जाता है
नैना मिचो तो वो सब दिख जाता है
मोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे मिलेंगे
तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे मिलेंगे

Wednesday, December 18, 2019

Slave or Master : Who Are You ?




I remember my neighbour getting angry over her wife and crying at highest pitches whenever he didn't get his lunch on time . Sometimes he also beat her in anger . I remember how an otherwise decent uncle made a mountain out of a molehill when he returned home thirsty on a scorching summer noon . Once he slapped his little son merely for asking if he had brought chocolate for him . On other occasions he would smile on it  . TV screens and newspapers are full of horrific news of murders, rapes and other crimes committed by people who are slaves of their feelings and passions .

In addition to these examples of extreme nature we see many people who are well educated and intelligent but their single occupation from morning till night seems nothing but to entertain themselves with different delicacies , drinks and sex . Their eyes glitter over any chance of getting them. They are easily bored in their absence . Such entertainments and tickling sensations are necessary to make them happy. Happiness seems to be an occasional episode in their general drama of pain . It is because the sources of their pleasures are temporary by nature and not without side effects. We know that excessive use anything is bad . Indiscriminate use of delicacies cause diseases .The widespread prevalence of diabetes, BP , gastric disorders takes its root in this mindless food habit and  lifestyle . We also see people destroying their health and life with the overuse of alcohol and drugs. Who doesn't know that these things are injurious to our health. Even then people indulge in such things just for short pleasures. Uncontrolled and careless indulgences have caused a great damage to the relations , peace and life of the millions of people from ages . It is not a secret .
Now the question is why people destroy their life.  If a person acts on his own , will he do anything which may harm himself? Let us find its answer. 
Let us look at the issue from a very practical point of view. We have heard the words slave and master in common conversations. A slave is someone who is bound to follow the orders from others and cannot use his own mind to question their validity and usefulness. If we follow all the orders and urges of our senses and are unable to resist them , we are no better than a slave . The only difference is that we don't realise that our own senses and desires are acting against us. An enemy in the guise of a friend. Our desire for sensual pleasures is insatiable and ever growing . It's in no one's power to satisfy them fully . Hence putting a wise curb is the only way out. Senses are the most notorious predators . They never let their prey stay at rest .

A master is someone who controls the other things and is not himself controlled by anything. He can control his senses and undue desires with wisdom .He is not tempted to the unending chain of activities to satiate his desires. He knows the nature of the desires and will not be fooled .

Now it's up to us what we want to be . If we want to become a slave and live a life of endless suffering , it's easy . The majority is already in the trap . If we want to be a master it needs a little awareness and practice . We must look at the feelings and thoughts, emotions and desires always popping in our minds and hearts from distance. We must look at them as something other than ourselves. Then we will be able to behave with them properly. The truth is that we are all born masters . God has created us in his own image. The only need is to realize our true nature and reach the perennial source of happiness within ourselves.

Thursday, December 12, 2019

जीवन , जरूरतें और अमीर


हमें अपने जीवन में क्या चाहिए ? किस चीज के लिए हम परेशान रहते हैं?हम जो भी करते हैं वह क्यों करते हैं? क्या कभी ऐसा समय आता है जब हम यह महसूस करते हैं कि अब हमने वह सब कुछ पा लिया है जो पाना चाहिए ? या फिर हमेशा ऐसे ही चलता रहता है? 
ये सारे सवाल क्या आपको भी परेशान करते हैं? यदि परेशान करते हैं तो इसका मतलब यह है कि आप मशीन और पशु नहीं हैं बल्कि आप एक विकासशील श्रेणी के मनुष्य हैं। एक जानवर जिंदगी के अर्थ और उद्देश्य के बारे में बिना सोचे या परेशान हुए जीवन बिता देता है । बहुत से मनुष्य भी ऐसे ही होते हैं। कुछ को खाने, पीने और आराम की कमी न हो तो उन्हें अन्य किसी चीज की जरूरत नहीं महसूस होती है। कुछ अन्य को धन चाहिए , उससे अधिक कुछ नहीं । वे भी उद्विकास के प्रारंभिक चरण में ही माने जाएंगे क्योंकि वे धन का उपयोग अपने खाने, पीने , रहने और आराम के स्तर को सुधारने में ही करते हैं ।  आइए इस प्रश्न पर विचार करते हैं । मैं यहाँ प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉक्टर अब्राहम मैस्लो के Hierarchy of Needs का जिक्र करना जरूरी समझता हूँ ।
एक व्यक्ति को सर्वप्रथम और सर्वाधिक जिस चीज की जरुरत होती है वह है प्राणवायु या ऑक्सिजन जिसके बिना जीवन की कल्पना ही असंभव है। यह ईश्वर द्वारा सबको प्रदत्त है। यदि इसे अदूरदर्शिता , स्वार्थ और लोभ वस खुद प्रदूषित न किया जाए तो यह आजीवन उपलब्ध रहता है  । अगली जरूरत भोजन है जो जरूरत भर के लिए अर्जित करना मुश्किल नहीं है । नींद, कामवासना और आराम की आवश्यकताऐं जैसे अन्य सभी जीवधारियों की अल्प प्रयास से ही पूरी हो जाती हैं उसी प्रकार इंसानों की भी थोड़े प्रयास से ही पूरी हो जाती हैं । आवास और सुरक्षा की सामान्य जरूरतें अन्य जीवों के जैसे मनुष्य की भी होती हैं जिसके लिए सदा प्रयासरत रहना पड़ता है । इस प्रकार " आहार, निद्रा , भय , संततित्व " की जरूरतें मनुष्य और पशु में समान रूप से होती हैं और ये जैविक जरूरतें हैं । इन चीजों को अन्य जानवर सहज भाव से बिना किसी नख़रे और दिखावे के स्वतःचालित  रूप से करते हैं लेकिन मनुष्य इसमें अपनी रुचि , बुद्धि और भाव के अनुसार बदलाव करते हुए करता है । 

इसके आगे एक और जरूरत है जो कुछ जानवरों को भी महसूस होती है । ये मिले तो उन्हें अच्छा लगता है लेकिन इसका अभाव वे ज्यादा अनुभव नहीं करते हैं। वह है प्यार और अपनापन । मनुष्य को यह भी चाहिए और ज़रूर चाहिए। इसका अभाव उसको अपने जीवन की निर्रथकता का अहसास कराता है ।उसकी जैविक आवश्यकता पूरी होती है तो वह प्यार और अपनापन को अपनी अगली जरूरत मानता है। वह इसे परिवार, दोस्त और कार्य स्थल आदि में ढूँढता है । जानवर ऐसा नहीं करते हैं। यह जरूरत मनुष्य को जानवरों से अलग करती है। बहुत से लोग इसे प्राप्त कर एक संतुष्ट जीवन जीते हैं।

इन ज़रूरतों के पूरा हो जाने पर जानवर संतुष्ट हो सकते हैं लेकिन मनुष्य नहीं। उसको तब सम्मान की जरूरत दिखने लगती है। वह पहले आत्मसम्मान के लिए किसी उपलब्धि को हासिल करने की कोशिश करता है । सफलता अर्जित करना चाहता है । आज़ादी के लिए प्रयास करता है। इससे वह खुद की नज़रों में सम्मानित महसूस करता है । इसके बाद वह समाज मे दूसरों से सम्मान चाहता है । प्रतिष्ठा और सामाजिक स्तर को प्राप्त करने की कोशिश करता है। यह मनुष्य के स्वभाव में है । इसमें अजीब कुछ भी नहीं ।सम्मान प्राप्त कर लेने पर कुछ लोग इसमें उलझ जाते हैं और अपनी आगे की ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ करते हैं । कभी महसूस भी करते हैं तो उन्हें डर लगता है और आंख मूद कर जीवन गुजार देते हैं।
परंतु कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनको इसके आगे भी जरूरत दिखाई देती है । उन्हें अब ज्ञान की प्यास होती है । वे चीज़ो को जानना चाहते हैं , खोजना चाहते हैं , आविष्कार करना चाहते हैं । वे जीवन के अर्थ और उद्देश्य के बारे में जानना चाहते हैं। वे जीवन के चूहा दौड़ से ऊपर उठकर सत्य के बारे में जानना चाहते हैं । यह ज्ञानपिपासा उन्हें ऊपर उठने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। ऐसे लोग अज्ञान को आनंद मानकर नहीं जी सकते ।

ज्ञान के अन्वेषण की यात्रा से अगली जरूरत उत्पन्न होती है । ऐसा व्यक्ति अब सौंदर्य बोध की आवश्यकता को महसूस करता है। उसे हर तरफ सुंदरता के दर्शन होते हैं ।उसे हर तरफ एक संतुलन और सुरूपता के दर्शन होते हैं । वह इन्हें ढूँढता है तो ये चीजें खुद को उसके सामने उपस्थित करती हैं ।

वाह्य जगत में सौंदर्य आदि का दर्शन व अनुभव करने के बाद भी कुछ लोग असन्तुष्ट रहते हैं । उन्हें किसी और चीज का अभाव अनुभव होता है। इसके लिए पूर्व के चरणों में तृप्त इच्छाओं की अपर्याप्तता उन्हें साफ दिखती है ।यह अवस्था है स्वप्रकटीकरण की । यह बेचैनी उन्हें स्व अर्थात खुद के वास्तविक रूप को देखने और प्रकट करने के लिए प्रेरित करती है।वे अपने यथार्थ स्वरूप को अनुभव और प्रकट करने का प्रयास करते हैं । वे अपनी समस्त संभावनाओं को मूर्त रूप देना चाहते हैं । आत्म तृप्ति के चरम अनुभव को प्राप्त करना चाहते हैं ।

इसके बाद परा अवस्था ( transcendentalism) का चरण आता है । यह दुर्लभ होता है। इसकी जरूरत महानतम लोगों को ही महसूस होती है । इसमें व्यक्ति स्व की सीमा के पार जाकर आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करता है । यह उन मूल्यों से प्रेरित होता है जो आत्मकेन्द्रित की जगह सर्वकेन्द्रित होते हैं। वह व्यष्टि से समष्टि की ओर बढ़ता है । उसे व्यष्टि और समष्टि के बीच का भेद मिटा दिखने लगता है। इसे व्यक्ति ईश्वर की आराधना , योग, धर्म पालन , परोपकार , कला , विज्ञान आदि के परमावस्था में प्राप्त होने वाले अलौकिक अनुभव के रूप में प्राप्त करता है । इसके बाद उसे पूर्ण संतुष्टि का अनुभव होता है।बेचैनी ख़त्म हो जाती है ।

अब हम विचार करते हैं कि अमीर कौन है और गरीब कौन है । आप इस बात से इनकार नहीं करेंगे कि अमीर वह है जो अपनी ज्यादा से ज्यादा जरूरतों को पूरा करने में समर्थ है । गरीब अपनी जरूरतों को नहीं पूरा कर पाता है । अब भी क्या आप को लगता है कि आप अपनी जरूरतों को पूरा करने के रास्ते पर हैं या कहीं एक जगह पहुँचकर रुक गए हैं ? वास्तविक अमीर बनिए , नकली नहीं । 

हम सब का धर्म है कि हम पूर्णता प्राप्त करने का प्रयास करें । मनुष्य के रूप में एक संपूर्ण मनुष्य बनें। थोड़े में सन्तुष्ट न हों । अब हमें खुद यह देखना है कि अब तक हम क्या पाए और अभी क्या पाना शेष है ।जैसे हम एक पूर्ण विकसित फूल को पसंद करते हैं वैसे ही कोई भी एक पूर्ण विकसित मनुष्य को पसंद करता है ।

Sunday, December 8, 2019

The Happiest People Have These Characteristics


1. They perceive reality efficiently and can  tolerate uncertainty;
2. Accept themselves and others for what they are;
3. Spontaneous in thought and action;
4. Problem-centred (not self-centred);
5. Unusual sense of humour;
6. Able to look at life objectively;
7. Highly creative;
8. Resistant to enculturation, but not purposely unconventional;
9. Concerned for the welfare of humanity;
10. Capable of deep appreciation of basic life-experience;
11. Establish deep satisfying interpersonal relationships with a few people;
12. Peak experiences;
13. Need for privacy;
14. Democratic attitudes;
15. Strong moral/ethical standards.

Friday, December 6, 2019

What Do We Want In Our Life

What do we generally want in our lives ? What motivates us to work ?  What makes us think that we have lived a fulfilled life ? Many people have dealt with these questions in many different ways . However I am impressed with the thoughtful treatment of these universal questions by the great scholar and psychologist Dr Maslow . He has given a five stage model describing the hierarchy of the needs.
1. Physiological needs -  These are the biological requirements for human survival, e.g. air, food, drink, shelter, clothing, warmth, sex, sleep.
If these needs are not satisfied the human body cannot function optimally. Maslow considered physiological needs the most important as all the other needs become secondary until these needs are met.
2. Safety needs - It includes protection from elements and security . This need is fulfilled by maintaining law and order in the society . It requires stability and freedom from fear.
3. Love and belongingness needs - After physiological and safety needs have been fulfilled, the third level of human needs are felt. It's a kind of social need and involves feelings of belongingness. The need for interpersonal relationships motivates our behavior in most cases.Examples include friendship, intimacy, trust,  acceptance, receiving and giving affection and love. Affiliating, being part of a group (family, friends, work) also form the important components in this list .
4. Esteem needs -  Maslow classified these needs into two categories: (i) esteem for oneself (dignity, achievement, mastery, independence) and (ii) the desire for reputation or respect from others (e.g., status, prestige).
He indicated that the need for respect or reputation is most important for children and adolescents and precedes real self-esteem or dignity.
5. Self-actualization needs - Realizing personal potential, self-fulfillment, seeking personal growth and peak experiences form this category of needs. A desire “to become everything one is capable of becoming" is the key to understand how to achieve the highest level of fulfilment in life.