Tuesday, October 27, 2020

कविता, मैं क्यों लिखता हूँ?

 मैं क्यों लिखता हूँ ? 


कलकल नदियाँ क्यों बहती हैं ?
फूल झूमकर क्यों खिलते हैं ?
पंछी कलरव क्यों करते हैं ?
चाँद चाँदनी क्यों बिखेरता ?

लगे भले सब को बेमानी
बातें पहली सी, पुरानी
कही गयी हों अगणित बार ।
मेरे लिए तो है इकबार ।

कुछ भाव तीब्र हो जाते हैं
कुछ बातें रुक ना पाती हैं ।
कुछ पाप किया सा लगता है
जब व्यक्त न दिल कर पाता है ।

अर्थ लाभ की चाह नहीं है
कीर्ति कामना मुझे नहीं है
अर्थयुक्त क्या यह जीवन है ?
अंतः सुख की चाह अभी है ।

लेखन चिंतन का वाहन है
व्यापक अनुभव का साधन है ।
प्राप्त एक जीवन वेला में
अगणित जीवन को जीना है ।

Wednesday, October 21, 2020

कुछ कविताएं/ Poems

 आदर्श


कितना मुश्किल होता है आदर्श को जीना
कहना आसान है मुश्किल है करना
अस्तित्व पर ही लग जाता है ग्रहण आदर्श के
जब सामना पड़ता है यह धर्मसंकट के
लोग लगते उठाने प्रश्न इसकी उपयोगिता पर कसते हैं जब फायदे , नुकसान की कसौटी पर
किंतु क्या आदर्श है उनके लिए
जो भागते पीछे सदा सुख के लिए
देखते अस्तित्व को अपने यहीं तक आप जो
यह है नहीं आदर्श का पथ आप के फिर साथ तो

दाम्पत्य

दाम्पत्य सुखमय है तो फिर क्या स्वर्ग से है क्या प्रयोजन ?
है अगर प्रतिकूल तो फिर नर्क से है क्या प्रयोजन ?

अनासक्त कर्मयोग

फूल केवल फूल होता है ।
यह खिलता है क्योंकि यह खिलता है ।
यह कब खुद के बारे में सोंचे ।
यह कब चाहे कि इसे कोई देखे ।

आत्मप्रशंसा

अपनी कहानी में तो होता हर कोई ही राम है ,
पर वही श्री राम है जो गैर की नजरों में हो ।

कविता, आगे बढ़ना /move on

 आगे बढ़ना


तू क्या जाने मुश्किल से कितनी ,
समझाया दिल को मैने ।
बेबस और लाचार हो कितना
लौटाया इसको मैने ।

कर रहम तू अब ,ना आग लगा ,
अब बची न हिम्मत है दिल में ।
हम लगे हैं जीने जहाँ है अब ,
ना जन्नत की फिर ललक जगा ।

कविता, बलात्कार

 कविता , बलात्कार

क्यों खून खौलता है तुम्हारा
किसी बलात्कार की खबर सुनकर ??
क्योंकि ,
बलात्कार एक जघन्य अपराध है ?
यह स्त्री की अस्मिता पर आघात है ?
यह उसकी इज्जत से खिलवाड़ है ?
यह उसके खिलाफ एक अत्याचार है ?

या तुम्हारा पुरुषत्व जगता है
एक विशेष प्रकार की हिंसा पर ?

तुम इंतजार करते हो कि
यह अत्याचार पहुंचे इस चरम पर
तब जागोगे तुम और तुम्हारी अंतरात्मा।
पहले इसके तुम भी करते हो बलात्कार
जाने अनजाने हर दिन हर सप्ताह
जब तुम बलात् रोकते हो उसे जन्म लेने से,
बराबरी करने से , पढ़ने से और बढ़ने से ,
जब जबर्दस्ती पढ़ाते हो उसे ऊँच- नीच ,
और अंतर मर्द - औरत के बीच ,
निर्भर रहना पुरुषों पर
रखवाली और रोटी के लिये ।
सिखलाते हो चुप रहना
अन्याय के खिलाफ ,
घर की इज्ज़त के लिये ।
और उसकी इज्जत?
बंद करो यह व्यर्थ विलाप , अनर्गल प्रलाप ,
आरम्भ करो सार्थक प्रयास ,रोको हठात् ,
इस बलात्कार को कर के रोज प्रयास
अपने घर में , पड़ोस में और कार्यस्थल पर ।
मत करो इंतजार एक और खबर आने की
और फिर से यह सब दुहराने की ।

कविता, व्यक्ति और समाज

 व्यक्ति और समाज 


तू कहता मैं ना देखूं ; कैसे ना देखूं ?
तू कहता अब मत बोलो , कैसे ना बोलूं ?
तू मना करे सुनने से मुझे , तू मना करे लड़ने से मुझे ।
तू कहे ना रख इतना हिसाब ; कैसे न रक्खूं ?

क्या पत्थर हूँ ? जड़ बृक्ष कोई या गीदड़ हूँ ?
अनुभूति शून्य नर अधम हूँ या अंधा हूँ ?
क्या श्रवण नहीं या भुजा नहीं है पास मेरे
जो समझ रहा तूँ मैं इतना गंदा हूँ ।

क्या पैदा होना ,भूख मिटाना , बढ़ते जाना ,
परिवार बढ़ाना फिर मर जाना जीवन है ?
फिर कीट पतंगे , पेड़ , मत्स्य , कुत्ते , बिल्ली
से श्रेष्ठ और उत्तम मानव तू कैसे है ?

जो मानव है तो मानवता के गुण दिखला ,
अन्याय करे जो गर कोई तो बिगुल बजा ।
यदि दीनहीन पर जुल्म करे जो गर कोई ,
रक्षक बन तू शस्त्र उठा मानव बन जा ।

कविता, अनासक्त कर्मयोग

 अनासक्त कर्मयोग

रंगमंच पर खड़ा है जब कोई अभिनेता
किरदार निभाना धर्म है उसका ।
सूत्रधार और निर्देशक की दी गयी भूमिकाओं में,
उत्साह से आनंद से और प्रेम से ,
मानो हो यह प्रियतम को रिझाने का
एक खूबसूरत अचूक तरीका ।

पर रंगमंच तो रंगमंच है !
भूल ना जाना खुद को ।

कविता, ईश्वर-वंदन

 उसने मुझे बनाया , 

या मैने उसे बनाया ?
इतना क्यों सोचूं ?
क्या फर्क पड़ता है ?
हम अलग ही कहाँ हैं
एक दूजे से !
वही तो मैं हूँ !
मैंही तो वह है !
बूँद और सागर के जैसे ।
कण और धरा के जैसे ।
वृक्ष और वन के जैसे ।
मिट्टी और घड़े के जैसे ।

कविता ,जीवन-यात्रा

 


जीवन एक यात्रा है
सदा गतिमान ,
जन्म से मृत्यु तक चलती है अविराम
बदलते रहते हैं लोग और नजारे ,
कभी सच में
कभी केवल हमारी नजरों में ,
निगाहें हमारी होतीं जिसकी जिम्मेदार।

एक सफर जहाँ सब ने तय कर रखी हैं
अपनी अपनी मंजिलें , अपने अपने रास्ते ।
ये मंजिलें ही अब जीवन हैं
इन्हें तय किसने किया ?अब याद नही !
पिता , माता , दादा , चाचा ,
पड़ोसी , रिश्तेदार या कोई और ?
याद नहीं । क्या फर्क पड़ता है ?
जरूरत , विलासिता , शान , इज्जत किस लिए ?
पता नहीं याद नही !
अब केवल मंजिल पता है और रास्ता याद है ।

अपनी धुन में चलता जा रहा है ।
अचानक बगल से निकली एक तेज रफ्तार गाड़ी
चमचमाती नयी , मेरे से अच्छी , मेरे से तेज ,
यह कैसे हो सकता है ? उसकी ये मजाल ?
बढ़ा दी मैने स्पीड और कुछ ही देर में
पछाड़ दिया उसे , अब चैन मिला
लेकिन यह क्या
फिर एक निकला ? फिर से एक संघर्ष ।
जीवन , विकास , इतिहास और वर्तमान ,
देश , समाज , परिवार और ' स्वयं ' के वास्ते
मेरी मंजिल मेरा रास्ता ?