अनासक्त कर्मयोग
रंगमंच पर खड़ा है जब कोई अभिनेताकिरदार निभाना धर्म है उसका ।
सूत्रधार और निर्देशक की दी गयी भूमिकाओं में,
उत्साह से आनंद से और प्रेम से ,
मानो हो यह प्रियतम को रिझाने का
एक खूबसूरत अचूक तरीका ।
पर रंगमंच तो रंगमंच है !
भूल ना जाना खुद को ।
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