Wednesday, October 21, 2020

कविता, व्यक्ति और समाज

 व्यक्ति और समाज 


तू कहता मैं ना देखूं ; कैसे ना देखूं ?
तू कहता अब मत बोलो , कैसे ना बोलूं ?
तू मना करे सुनने से मुझे , तू मना करे लड़ने से मुझे ।
तू कहे ना रख इतना हिसाब ; कैसे न रक्खूं ?

क्या पत्थर हूँ ? जड़ बृक्ष कोई या गीदड़ हूँ ?
अनुभूति शून्य नर अधम हूँ या अंधा हूँ ?
क्या श्रवण नहीं या भुजा नहीं है पास मेरे
जो समझ रहा तूँ मैं इतना गंदा हूँ ।

क्या पैदा होना ,भूख मिटाना , बढ़ते जाना ,
परिवार बढ़ाना फिर मर जाना जीवन है ?
फिर कीट पतंगे , पेड़ , मत्स्य , कुत्ते , बिल्ली
से श्रेष्ठ और उत्तम मानव तू कैसे है ?

जो मानव है तो मानवता के गुण दिखला ,
अन्याय करे जो गर कोई तो बिगुल बजा ।
यदि दीनहीन पर जुल्म करे जो गर कोई ,
रक्षक बन तू शस्त्र उठा मानव बन जा ।

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