हमें अपने जीवन में क्या चाहिए ? किस चीज के लिए हम परेशान रहते हैं?हम जो भी करते हैं वह क्यों करते हैं? क्या कभी ऐसा समय आता है जब हम यह महसूस करते हैं कि अब हमने वह सब कुछ पा लिया है जो पाना चाहिए ? या फिर हमेशा ऐसे ही चलता रहता है?
ये सारे सवाल क्या आपको भी परेशान करते हैं? यदि परेशान करते हैं तो इसका मतलब यह है कि आप मशीन और पशु नहीं हैं बल्कि आप एक विकासशील श्रेणी के मनुष्य हैं। एक जानवर जिंदगी के अर्थ और उद्देश्य के बारे में बिना सोचे या परेशान हुए जीवन बिता देता है । बहुत से मनुष्य भी ऐसे ही होते हैं। कुछ को खाने, पीने और आराम की कमी न हो तो उन्हें अन्य किसी चीज की जरूरत नहीं महसूस होती है। कुछ अन्य को धन चाहिए , उससे अधिक कुछ नहीं । वे भी उद्विकास के प्रारंभिक चरण में ही माने जाएंगे क्योंकि वे धन का उपयोग अपने खाने, पीने , रहने और आराम के स्तर को सुधारने में ही करते हैं । आइए इस प्रश्न पर विचार करते हैं । मैं यहाँ प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉक्टर अब्राहम मैस्लो के Hierarchy of Needs का जिक्र करना जरूरी समझता हूँ ।
एक व्यक्ति को सर्वप्रथम और सर्वाधिक जिस चीज की जरुरत होती है वह है प्राणवायु या ऑक्सिजन जिसके बिना जीवन की कल्पना ही असंभव है। यह ईश्वर द्वारा सबको प्रदत्त है। यदि इसे अदूरदर्शिता , स्वार्थ और लोभ वस खुद प्रदूषित न किया जाए तो यह आजीवन उपलब्ध रहता है । अगली जरूरत भोजन है जो जरूरत भर के लिए अर्जित करना मुश्किल नहीं है । नींद, कामवासना और आराम की आवश्यकताऐं जैसे अन्य सभी जीवधारियों की अल्प प्रयास से ही पूरी हो जाती हैं उसी प्रकार इंसानों की भी थोड़े प्रयास से ही पूरी हो जाती हैं । आवास और सुरक्षा की सामान्य जरूरतें अन्य जीवों के जैसे मनुष्य की भी होती हैं जिसके लिए सदा प्रयासरत रहना पड़ता है । इस प्रकार " आहार, निद्रा , भय , संततित्व " की जरूरतें मनुष्य और पशु में समान रूप से होती हैं और ये जैविक जरूरतें हैं । इन चीजों को अन्य जानवर सहज भाव से बिना किसी नख़रे और दिखावे के स्वतःचालित रूप से करते हैं लेकिन मनुष्य इसमें अपनी रुचि , बुद्धि और भाव के अनुसार बदलाव करते हुए करता है ।
इसके आगे एक और जरूरत है जो कुछ जानवरों को भी महसूस होती है । ये मिले तो उन्हें अच्छा लगता है लेकिन इसका अभाव वे ज्यादा अनुभव नहीं करते हैं। वह है प्यार और अपनापन । मनुष्य को यह भी चाहिए और ज़रूर चाहिए। इसका अभाव उसको अपने जीवन की निर्रथकता का अहसास कराता है ।उसकी जैविक आवश्यकता पूरी होती है तो वह प्यार और अपनापन को अपनी अगली जरूरत मानता है। वह इसे परिवार, दोस्त और कार्य स्थल आदि में ढूँढता है । जानवर ऐसा नहीं करते हैं। यह जरूरत मनुष्य को जानवरों से अलग करती है। बहुत से लोग इसे प्राप्त कर एक संतुष्ट जीवन जीते हैं।
इन ज़रूरतों के पूरा हो जाने पर जानवर संतुष्ट हो सकते हैं लेकिन मनुष्य नहीं। उसको तब सम्मान की जरूरत दिखने लगती है। वह पहले आत्मसम्मान के लिए किसी उपलब्धि को हासिल करने की कोशिश करता है । सफलता अर्जित करना चाहता है । आज़ादी के लिए प्रयास करता है। इससे वह खुद की नज़रों में सम्मानित महसूस करता है । इसके बाद वह समाज मे दूसरों से सम्मान चाहता है । प्रतिष्ठा और सामाजिक स्तर को प्राप्त करने की कोशिश करता है। यह मनुष्य के स्वभाव में है । इसमें अजीब कुछ भी नहीं ।सम्मान प्राप्त कर लेने पर कुछ लोग इसमें उलझ जाते हैं और अपनी आगे की ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ करते हैं । कभी महसूस भी करते हैं तो उन्हें डर लगता है और आंख मूद कर जीवन गुजार देते हैं।
परंतु कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनको इसके आगे भी जरूरत दिखाई देती है । उन्हें अब ज्ञान की प्यास होती है । वे चीज़ो को जानना चाहते हैं , खोजना चाहते हैं , आविष्कार करना चाहते हैं । वे जीवन के अर्थ और उद्देश्य के बारे में जानना चाहते हैं। वे जीवन के चूहा दौड़ से ऊपर उठकर सत्य के बारे में जानना चाहते हैं । यह ज्ञानपिपासा उन्हें ऊपर उठने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। ऐसे लोग अज्ञान को आनंद मानकर नहीं जी सकते ।
ज्ञान के अन्वेषण की यात्रा से अगली जरूरत उत्पन्न होती है । ऐसा व्यक्ति अब सौंदर्य बोध की आवश्यकता को महसूस करता है। उसे हर तरफ सुंदरता के दर्शन होते हैं ।उसे हर तरफ एक संतुलन और सुरूपता के दर्शन होते हैं । वह इन्हें ढूँढता है तो ये चीजें खुद को उसके सामने उपस्थित करती हैं ।
वाह्य जगत में सौंदर्य आदि का दर्शन व अनुभव करने के बाद भी कुछ लोग असन्तुष्ट रहते हैं । उन्हें किसी और चीज का अभाव अनुभव होता है। इसके लिए पूर्व के चरणों में तृप्त इच्छाओं की अपर्याप्तता उन्हें साफ दिखती है ।यह अवस्था है स्वप्रकटीकरण की । यह बेचैनी उन्हें स्व अर्थात खुद के वास्तविक रूप को देखने और प्रकट करने के लिए प्रेरित करती है।वे अपने यथार्थ स्वरूप को अनुभव और प्रकट करने का प्रयास करते हैं । वे अपनी समस्त संभावनाओं को मूर्त रूप देना चाहते हैं । आत्म तृप्ति के चरम अनुभव को प्राप्त करना चाहते हैं ।
इसके बाद परा अवस्था ( transcendentalism) का चरण आता है । यह दुर्लभ होता है। इसकी जरूरत महानतम लोगों को ही महसूस होती है । इसमें व्यक्ति स्व की सीमा के पार जाकर आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करता है । यह उन मूल्यों से प्रेरित होता है जो आत्मकेन्द्रित की जगह सर्वकेन्द्रित होते हैं। वह व्यष्टि से समष्टि की ओर बढ़ता है । उसे व्यष्टि और समष्टि के बीच का भेद मिटा दिखने लगता है। इसे व्यक्ति ईश्वर की आराधना , योग, धर्म पालन , परोपकार , कला , विज्ञान आदि के परमावस्था में प्राप्त होने वाले अलौकिक अनुभव के रूप में प्राप्त करता है । इसके बाद उसे पूर्ण संतुष्टि का अनुभव होता है।बेचैनी ख़त्म हो जाती है ।
अब हम विचार करते हैं कि अमीर कौन है और गरीब कौन है । आप इस बात से इनकार नहीं करेंगे कि अमीर वह है जो अपनी ज्यादा से ज्यादा जरूरतों को पूरा करने में समर्थ है । गरीब अपनी जरूरतों को नहीं पूरा कर पाता है । अब भी क्या आप को लगता है कि आप अपनी जरूरतों को पूरा करने के रास्ते पर हैं या कहीं एक जगह पहुँचकर रुक गए हैं ? वास्तविक अमीर बनिए , नकली नहीं ।
हम सब का धर्म है कि हम पूर्णता प्राप्त करने का प्रयास करें । मनुष्य के रूप में एक संपूर्ण मनुष्य बनें। थोड़े में सन्तुष्ट न हों । अब हमें खुद यह देखना है कि अब तक हम क्या पाए और अभी क्या पाना शेष है ।जैसे हम एक पूर्ण विकसित फूल को पसंद करते हैं वैसे ही कोई भी एक पूर्ण विकसित मनुष्य को पसंद करता है ।

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